शीर्षक :पुरुषोत्तम मास का रहस्य
डॉ सीमा मोरवाल
ऋतु का आधार प्रकृति है। प्रकृति के विषय में शास्त्र कारों के विचार भिन्न-भिन्न रहे हैं दृश्य जगत को ही प्रकृति कहते हैं। दृश्य जगत में आकाश ,अंतरिक्ष, देव ,भूमि जल ,अनिल ,अनल ,दोनों संध्याकाल ,ग्रह, नक्षत्र नदी पर्वत ,वन एवं अन्य नश्वर वस्तुओं का संघात रहता है। इन वस्तुओं को देखकर हमारे ऋषि-मुनियों ने अपनी अध्यात्म चेतना ग्रहण की और चिंतन परंपरा की कड़ी को आगामी पीढ़ी के हाथ सौंपा ।उन्होंने प्राकृतिक सौंदर्य से मुग्ध होकर केनेदम निर्मितम् जगत्:? इस दृश्य जगत का निर्माता कौन है ?इस जिज्ञासा मे प्रश्न को उठा कर हिरण्यगर्भ संवर्तताग्रे भूतस्य जातः प्रतिरेकासीत। सदाधार पृथ्वीदयामुतेमा कस्मै देवयहविषा विधेमय।। अर्थात हिरण्यगर्भ भारतीय विचार धारा मे सृष्टि का आरंभिक स्त्रोत्र माना जाता है ।इस का शाब्दिक अर्थ है प्रदीप्त गर्भ ( उत्पत्ति का स्थान ) सब सूर्य आदि तेजस्वी पदार्थो का आधार जो जो जगत हो या होयेगा।उसका आधार परमात्मा जगत की उत्पत्ति के पूर्व विद्यमान था।जिसने पृथ्वी और सूर्य ,तारों का सृजन किया।उस देव की भक्ति किया करे।श्लोक मे *हिरण्य गर्भ ***का अर्थ ईश्वर से है ,इस भावना का सूत्रपात किया। * “या आत्मदा बलदा यस्य विश्व उपाससे यस्य छाया अमृतम यस्य म्रत्यु कस्मै देवाय हविषा विधेम।।”* आदि का चिंतन करके एक विराट सत्ता को सब का निर्माता माना ।प्रकृति व जीवन के सामंजस्य से भावनाओं के उद्भव एवं उद्रेक को गतिशील बनाकर एक ओर प्रकृति की सुंदरता के चित्र उपस्थित हुए, वहीं लोकमन उन सुंदर दृश्यों को देखकर गीत गा उठा। *प्रकृति तथा वनस्पति जगत का यही हल्के गहरे रंगों का छाया ताप, पक्षियों का स्वर लय तरंगित संगीत, स्थिरता की दृढ़ भावना के लिए आकाश में फैला हुआ पर्वत का महा विस्तार, सरिता का निरंतर गतिशील प्रवाह, गगन में फैली हुई उषा की अरुणाभा और रजनी का तारों से युक्त नीला आकाश यह समस्त प्रकृति का श्रंगार मानव के मन के मनोभावों को सौंदर्य की स्थिति प्रदान करता है ।। *प्रकृति ऋतु के उस आवागमन के प्रत्यावर्तीत् स्वरूप को कहते हैं जो सतत दृश्य जगत की स्थाई वस्तुओं के साथ अपना सौंदर्य संबंध जोड़ कर उसके स्थिर अस्थिर वस्तुओं को रमणीयता एवं चित्त आकर्षकता देती है। इसलिए हम देखते हैं कि अरती यथा क्रमेण आगच्छति इति ऋतु। जो क्रम से स्वतः ही आती है वह ऋतु है। ऋतु का अर्थ वह मास क्रम जो पृथ्वी ,जल ,तेज, वायु और आकाशीय तत्वों को गति में करके उनकी गतिमय करके उनकी गति मे नवीनता का उन्मेष करके उन्हें प्राणप्रद जीवंत अणु तत्वों से उद्दीप्त करती है।* भारत में ऋतुओं को दो मासों में आबद्ध किया है ।। चैत्र -वैशाख वसंत ऋतु , जेठ- आषाढ़ ग्रीष्म ऋतु, सावन -भादो, वर्षा ऋतु आश्विन -कार्तिक शरद ऋतु मार्गशीर्ष-पौष, शिशिर ऋतु माघ- फाल्गुन हेमंत ऋतु। वैदिक काल में ऋतुओं का क्रम कुछ और ही था ।वैदिक मनीषियों ने सोचा रात के बाद दिन दिन के बाद रात का क्रम चल रहा है उसका नाम उन्होंने अहोरात्र रखा। फिर चंद्रमा की गति से घटते बढ़ते समय को देखकर चंद्रमास की कल्पना की। पुनः देखा जाड़ा ,गर्मी ,बरसात एक क्रम में आ रहे हैं इसलिए इसका नाम ऋतु देकर कालगणना ऋतुओं के आधार पर होने लगी ।समस्त काल को वर्ष का नाम दिया गया ।वर्ष का आरंभ वर्षा ऋतु से माना जाने लगा वर्ष का पर्यायवाची वत्सर या संवत्सर शब्द हुआ। जिसका अर्थ था जिसमें सभी ऋतुएं क्रमशः आकर अपना प्रभाव दिखाएं। वह वत्सर या संवत्सर हुआ। फिर अगहन को (अग्रहण) को वत्सर का प्रारंभिक बिंदु माना गया। वर्षा, शरद, वसंत आदि ऋतुओं का क्रमशः आगमन देखते-देखते ऋतु नियम का निर्धारण भारतीय चिंतकों ने किया। अधिक चिंतन व खोज करने पर यह ज्ञात हुआ कि वर्ष अर्थात संवत्सर में ऋतु दो -दो मास के क्रम से रखने पर इनमें भी यथा समय का क्रम घट व बढ़ होने लगा तब तेरहवें मास की कल्पना करनी पड़ी ।तेरहवें मास का हिसाब लगाने से ऋतु अपने क्रम पर आती रहें या रहेंगी यह नियम बना। जिससे अधिक मास की उत्पत्ति हुई। जिसे मल मास भी कहा जाने लगा।पुरषोत्तम मास भी कहने के पीछे अभिप्राय ये है कि यह मास सर्वोत्तम है,। ईश्वर का भजन करने हेतु यत् धार्मिक अनुष्ठान हेतु अतरिक्त समय का मिलना।इस कारण इसे विशेष मास का दर्जा प्राप्त हुआ। जिसे” अहंसेस्पति” बताया गया है। तैत्तरीय उपनिषद मे कहा गया ऋतुओं के कारण संवत्सर की प्रतिष्ठा हुई। इस संहिता मे दो -दो मास के विभाजन का क्रम है जैसे- वसंत के दो मास मधु व माधव(ज्येष्ठ वैशाख), ग्रीष्म के दो मास शुक्र और शुचि (जेष्ठ आसाढ़) ,वर्षा ऋतु के दो मास नभ व नाभस्या (सावन भादो),शरद के दो मास सह ओर सहस्य (मार्घशीर्ष पौष) ,शिशिर के दो मास तप तपस्या (माघ फाल्गुन।इस प्रकार हम पाएंगे कि ऋतु काल वैदिक कालीन चिंतन की देन है *वैदिक काल से ही ऋतुओं का यह महत्व चला आ रहा है।इन पर आधारित अनेक पर्व व उत्सव सभी जन सम्मिलित हो कर मानते आए है।अब सावन मे श्रावणी पूर्णिमा पर रक्षा बंधन मनाया जाएगा।हरियाली तीज सभी महिलाएं मनाएंगी। वैदिक समय मे इन उत्सवों के समय यज्ञ मे ऋतुओं के नाम से आहुति दी जाती थी।- यथा -ओ वसन्तेण ऋतुना देवाः वसवस्त्रि वृतास ताः—- स्वाहा।। ग्रीष्म ऋतुना देवा: रुद्रा:पंचदासस्तुत:—–स्वाहा। इस प्रकार इन दो दो मासों की ऋतुओं को क्रम पूर्वक आना चाहिए । अतः वर्ष में चल कर कभी-कभी तेरहवां मास भी माना गया है । यह जब भी आता है हिन्दू वैष्णव समाज कथा भागवत श्रवण कर पुण्य लाभ करते है। * ऋतु विज्ञान भारतीय मनीषियों की एक ऐसी उर्वर उपज है जो विश्व के सभी विज्ञानों मे अपने मौलिक ज्ञान की पताका फहरा रहे है। ऋतु विज्ञान पर ही आधारित भारतीय किसान अपना कृषि कार्य करते है।लोक के कवि घाघ व भड्डरी ने कितनी कहावतें इसी आधार पर बनाई है। वह आज भी ग्रामीण जानो के मध्य प्रचलित हैं। आगे सूर्य व ऋतुओं के ही आधार पर उत्तरायण व दक्षिणायन माने गए। शतपथ ब्राह्मण उपनिषद मे उल्लेख है कि वसंत व वर्षा देव ऋतु है। शरद, हेमंत व शिशिर ये पितर ऋतुएं है। जब उत्तर की ओर सूर्य रहता है वे देव ऋतुएं व दक्षिण मे सूर्य तो वे पितरों को यज्ञ,दान,श्राध्द आदि कर्मो को निष्पन्न किया जाता है । ऋतुओं व माह मे संबंध बना रहे इस विचार को लेकर पूर्णिमा के चंद्र की स्थिति व ऋतुओ की स्थिति के लिए तारों के नाम से महीनों को नाम दिया गया। इस प्रकार सत्ताईस नक्षत्र चंद्र गति का मान देकर पूर्णिमा की समाप्ति पर चंद्रमा जिस नक्षत्र मे प्रवेश करे जिस नक्षत्र से संबंधित हो उसी के नाम पर मास का नाम रख दो।जैसे ज्येष्ठा,श्रवण,कृतिका । इस प्रकार देखा जाए भारतीय संस्कृति व ऋतुओं का क्यो विशेष स्थान है? तथा पुरुषोत्तम मास क्यो मनाया जाता है ? इस विषय पर इस लेख के माध्यम से पाठकों की जिज्ञासा अवश्य शांत हो सकेगी।