वर्तमान शिक्षा-सेवा से व्यापार तक
भटकती शिक्षा
शिक्षा मनुष्य को योग्य बनाती है।जीवन मे नीति और नियम का पालन अनुशासन से करना सिखाती है।अगर शिक्षा देने की व्यवस्था को बंद कर दिया जाए तो मानव जीवन पटरी से उतर जाएगा।बहरहाल ऐसा कभी हुआ नही।
हाँ शिक्षा की पद्धति भावना और प्रकार समय के साथ बदलते रहे हैं।वास्तव में प्रकार और पद्धति समय के साथ बदलना अच्छा लगता है।परंतु भावना बदल जाये तो लक्ष्य में भटकाव आ जाता है।और आज भटकती हुई शिक्षा ही वर्तमान स्वरूप में हमारे सामने उपस्थित है।
एक कहावत है-
“अंधे के आगे रोवे अपने नैना खोवे”
अगर आँखों से दिखाई देने वाले के आहे रोने से भी नैना खोने लगें तो समझ लो व्यवस्था में बड़ा दोष है।और समाज की भावना ने अंधे और आंखों वाले में भेद करना छोड़ दिया है।
अर्थात पढ़े लिखे और अनपढ़ सब जब एक समान हो जाएं तो शिक्षित की पहचान कैसे की जा सकती है।
फर्जी डिग्रियों का बड़ा खेल,फर्जी प्रमाणपत्रों की दर दर पर दुकानों का सज जाना,योग्यता को ठेंगा दिखाती है।
सेवा की भावना से शिक्षा समाज को अनुशासित और योग्य व सम्रद्ध बनाती थी ।आज शिक्षा ने इन मानदंडों को हाशिये पर रखकर इसे व्यवसाय का रूप दे दिया और व्यवसाय भी ऐसा जिसके सारे मानक ताक पर रख दिये जायें।।
गरीब की पहुंच से बाहर होती हमारी शिक्षा
हम अपने दोषों को छिपाने के।लिये कब तक मैकाले को दोषी बताते रहेंगे।मैकाले की सोच से बहुत नीचे तक हम आज भारतीय शिक्षा को ले जा चुके हैं।निश्चित ही मैकाले की आत्मा आज अत्यंत प्रसन्न होती होगी कि जो बीज उसने लगाया था वह वट व्रक्ष बन गया और फलता ही जा रहा है।जब से सी बी एस ई बोर्ड ने अपने पांव पसारे तो शिक्षा गरीब की पहुंच से बाहर हो गयी।
कॉन्वेंट स्कूलों में प्रतिवर्ष फीस के बढ़ते बोझ के साथ यूनिफॉर्म और सिलेबस में चेंजिंग के लिये मोटी रकम लाना गरीब तो क्या सामान्य मध्यम वर्ग के भी आर्थिक बजट से बाहर होता जा रहा है।विभागीय अधिकारियों और सत्ता में बैठे लोगों के लिये मैंने पहले ही लिख दिया।कि अंधे के आगे रोवे………………… तो शिक्षा के इस रूप की कल्पना कभी किसी ने नहीं कि थी।
प्रतियोगी परीक्षाओं के लीक होते पेपर
शिक्षा देने के जिम्मेदार लोग जब अनैतिक हो जाएं तो ऐसी शिक्षा देश और समाज का क्या भला करेगी।? सत्ता बड़ी मुस्तेदी से पारदर्शिता के प्रयास करती है और जिम्मेदार ही उसमें सेंध लगा देते हैं।तो लाखों की दिन रात की मेहनत बर्बाद हो जाती है।फिर से परीक्षा फिर पेपर लीक की जांच और दोषियों को सजा ,यह भारतीय शिक्षा का कौन सा रूप है।
अयोग्य को जिम्मेदारी और योग्य को ठकेल
भारतीय शिक्षा का ऐसा खेल हम सब दिन रात देखते हैं।जब अयोग्य व्यक्ति जिम्मेदार बन जाते हैं।और योग्य व्यक्ति रेहड़ी या रिक्शा खींचते हैं।अर्थात जुगाड़ और सविधान की अधूरी व्यवस्था योग्यता पर लगातार भारी पड़ रही है।और जब एक अयोग्य व्यक्ति जिम्मेदारी संभालता है तो काम की गुणवत्ता प्रभावित होगी ही उसे रोका नहीं जा सकता है।
एक देश एक शिक्षा बोर्ड
भारत एक देश है तो शिक्षा बोर्ड भी एक होना चाहिये।जिससे देश की भावी पीढ़ी के साथ भेदभाव न हो।सवाल यह उठता है कि एक बोर्ड कौन सा बोर्ड हो तो वह सी बी एस ई बोर्ड भी हो सकता है।जबकि आज देश मे हो यह रहा है कि सी बी एस ई बोर्ड एक नम्बर का माना जाता है और प्रदेशों के शिक्षा बोर्ड दोयम दर्जे के माने जाते है।शिक्षा में यह भेदभाव कब तक चलेगा।इसका समाधान बहुत जरूरी है।उत्तर प्रदेश माध्यमिक शिक्षा बोर्ड आजादी से पहले गठित हुआ ।सी बी एस ई शिक्षा बोर्ड आजादी से पहले गठित हुआ।समय समय पर इनमें परिवर्तन तो हुए लेकिन आज जरूरत पूरे देश मे एक शिक्षा बोर्ड को लागू करने की है।
सशक्त और सम्रद्ध राष्ट्र में नागरिक अनुशासन की अगर कोई पूर्ति कर सकता है तो वह दोष रहित शिक्षा ही पूर्ति कर सकती है।और कोई विकल्प इसके लिये नहीं है।
अजय कुमार अग्रवाल
समाज चिंतक,स्वतंत्र पत्रकार